सुनने में आपके उपकरण की आवाज़ उपयोग होती है। यह हमारी व्याख्या पढ़ती है; यह गाई हुई आरती या संस्कृत उच्चारण का पाठ नहीं है।
Bhagavad Gita 2.50
परंपरागत पाठ
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
रोमन अक्षरों में पाठ-सहायिका
buddhi-yukto jahātīha ubhe sukṛta-duṣkṛte |
tasmād yogāya yujyasva yogaḥ karmasu kauśalam ||
सरल भाषा में अर्थ
विवेकपूर्ण बुद्धि से युक्त व्यक्ति यहाँ पुण्य और पाप दोनों के बंधन से ऊपर उठता है। इसलिए योग में लगो; योग कर्म करने का कौशल है।
शिक्षा समझें
प्रसिद्ध अंतिम वाक्य उस बुद्धि की चर्चा के बाद आता है जिसके साथ कर्म किया जाता है। इस प्रसंग में कौशल का अर्थ फल को अपना बनाने की लालसा से बँधे बिना कर्म करने की क्षमता भी है। पुण्य-पाप की बात कर्म और मुक्ति के संदर्भ में है। श्लोक केवल किसी भी चुने हुए काम में दक्ष होने का नारा नहीं है।
तकनीकी दक्षता और नैतिक विचार साथ बढ़ सकते हैं। जल्दी पूरे हुए समूह-कार्य में भी शुद्धता, उचित श्रेय और दूसरों पर प्रभाव जाँचना पड़ सकता है। गीता का व्यापक प्रश्न है कि काम का निर्देशन किस प्रकार की बुद्धि कर रही है। यह प्रश्न दैनिक काम में लाने से अंतिम वाक्य गति या चतुराई की प्रशंसा से अधिक गहरा बनता है।
शब्द और पद
- बुद्धियुक्तः (buddhi-yuktaḥ)
- विवेकपूर्ण बुद्धि से युक्त
- सुकृतदुष्कृते (sukṛta-duṣkṛte)
- पुण्य और पाप
- योगाय युज्यस्व (yogāya yujyasva)
- योग में लगो
- कर्मसु कौशलम् (karmasu kauśalam)
- कर्मों में कौशल

रुककर विचार करें
कोई छोटा रास्ता काम जल्दी पूरा कर देता है, पर दूसरे का योगदान छिपाता है। क्या यही प्रशंसित कौशल है?
व्याख्या सहित उत्तर देखें
उस छोटे रास्ते में यहाँ वर्णित विवेकपूर्ण, जिम्मेदार समझ का अभाव है। मैं ऐसा तरीका खोज सकता हूँ जो कुशल और ईमानदार हो तथा पूरा श्रेय लेने की इच्छा से कम संचालित हो।
