सुनने में आपके उपकरण की आवाज़ उपयोग होती है। यह हमारी व्याख्या पढ़ती है; यह गाई हुई आरती या संस्कृत उच्चारण का पाठ नहीं है।
Bhagavad Gita 2.47
परंपरागत पाठ
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
रोमन अक्षरों में पाठ-सहायिका
karmaṇy evādhikāras te mā phaleṣu kadācana |
mā karma-phala-hetur bhūr mā te saṅgo ’stv akarmaṇi ||
सरल भाषा में अर्थ
तुम्हारी जिम्मेदारी कर्म करने की है; परिणाम तुम्हारे आदेश पर नहीं है। फल को ही अपना एकमात्र उद्देश्य मत बनाओ और निष्क्रियता से भी लगाव मत रखो।
प्रसंग समझें
कृष्ण अर्जुन को अनुशासित कर्म समझा रहे हैं। अंतिम भाग महत्त्वपूर्ण है: निश्चित सफलता की जिद छोड़ना जिम्मेदारी से बचने का बहाना नहीं है। विद्यार्थी योजना, अभ्यास और गलतियों का सुधार कर सकता है, साथ ही मान सकता है कि परिणाम निजी प्रयास से बाहर के कारणों पर भी निर्भर है। यह जीवन में प्रयोग है, अंक पाने की गारंटी नहीं।

रुककर विचार करें
क्या यह श्लोक काम की गुणवत्ता की उपेक्षा करने को कहता है?
व्याख्या सहित उत्तर देखें
नहीं। सावधानी से कर्म करना हमारी जिम्मेदारी है। भेद काम को गंभीरता से करने और उसके फल पर पूर्ण नियंत्रण माँगने के बीच है।
