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हनुमान जी का श्री राम-श्री लक्ष्मण से मिलन: मैत्री का मार्ग खोलती वाणी

सुग्रीव के भयग्रस्त आश्रय से नई मैत्री की साक्षी अग्नि तक हनुमान जी के साथ चलें और समझें कि विद्या, सूझबूझ तथा संवेदनापूर्ण श्रवण सेवा कैसे बनते हैं।

PLS फाउंडेशन द्वारा · · 7 मिनट पढ़ाई, और अभ्यास

इस पाठ के अंत तक: पहले मिलन का क्रम सुनाएँ; हनुमान जी की वाणी पर श्री राम की प्रशंसा, श्री लक्ष्मण की भूमिका और मैत्री के व्यावहारिक दायित्व समझाएँ।

यह विषय सीधे पढ़ें, या शृंखला अपनाएँ: वाल्मीकि रामायण में हनुमान जी

मुख्य विचार

किष्किन्धाकाण्ड 3–5 में हनुमान जी सुग्रीव के दूत बनकर दोनों भाइयों से मिलते हैं, परिचय देते हैं, उनका दुःख सुनते हैं और सुग्रीव से उनकी मैत्री कराते हैं। श्री राम उनकी वाणी में विद्या और सावधानी पहचानते हैं। इस मिलन में भक्ति के साथ दोनों पक्षों को समझने तथा विश्वसनीय कर्म का मार्ग बनाने का दूत-धर्म जुड़ता है।

दो प्रकार के दुःख पास आते हैं

इन पाठों में पावन इतिहास की वाल्मीकि रामायण में वर्णित कथा का अनुसरण है। इस मिलन के आरंभ में श्री राम और श्री लक्ष्मण माँ सीता की खोज कर रहे हैं; उधर सुग्रीव अपने भाई वाली से हुए संघर्ष के भय में रहते हैं। आश्रय के निकट आए दो बलशाली अपरिचित सहायता भी हो सकते हैं और संकट भी। इसलिए हनुमान जी के सामने वास्तविक जिम्मेदारी है: सबका भय बढ़ाए बिना यह जानना कि वे कौन हैं। किष्किन्धाकाण्ड 3 उनके ऋष्यमूक से प्रस्थान और सुग्रीव के मंत्री होने का परिचय देता है। यह परिस्थिति मिलन को गहराई देती है। कोई पक्ष राजसभा की सुरक्षा में नहीं बैठा। आगे का मार्ग इस बात पर निर्भर है कि शोक और आशंका सच्चे संवाद में बदल पाते हैं या नहीं। समुद्र पार करने से बहुत पहले हनुमान जी की महानता लोगों के बीच की दूरी पार करने की तत्परता में दिखाई देती है। दुःख को सुनने वाला योग्य दूत यहाँ नई संभावना का द्वार खोलता है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, संस्कृत पाठ ↗

सावधान आगमन और स्पष्ट परिचय

हनुमान जी भिक्षु का रूप धारण करके आदरपूर्वक पास आते हैं और कोमल वाणी में बोलते हैं। वे भाइयों के तपस्वी-वस्त्र, विशाल भुजाएँ और आयुध देखते हैं: यह रूप प्रश्न उत्पन्न करता है, अपने-आप उत्तर नहीं देता। उनकी प्रशंसा दोनों का गौरव पहचानती है, साथ ही वे पूछते हैं कि इस प्रदेश में आने का प्रयोजन क्या है। दोनों मौन रहते हैं तो हनुमान जी अपने भेजे जाने का कारण बताते हैं। वे सुग्रीव का नाम लेते हैं, भाई से मिले दुःख का परिचय देते हैं और स्वयं को वायुपुत्र हनुमान जी तथा सुग्रीव का मंत्री बताते हैं। वे भिक्षु का रूप धारण करने की बात भी स्पष्ट करते हैं। प्रसंग सतर्क निरीक्षण से खुले संवाद की ओर बढ़ता है। केवल सुंदर बोल लेने से उनका काम पूरा नहीं होता। भाइयों को जानना आवश्यक है कि वे किसके प्रतिनिधि हैं और क्यों आए हैं। यह परिचय देकर हनुमान जी रुकते हैं और उत्तर के लिए स्थान छोड़ते हैं। उनका मौन भी संवाद की मर्यादा का अंग बनता है।

कालीघाट चित्र में हनुमान जी पेड़ों से ढका पर्वत उठाए हैं; नीचे श्री राम घायल श्री लक्ष्मण को सहारा दे रहे हैं।
कालीघाट चित्र में श्री लक्ष्मण के लिए पर्वत लाते हनुमान जी; यह रामायण के बाद के प्रसंग का चित्रण है। · Wellcome Library, London · CC BY 4.0

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, संस्कृत पाठ ↗

हनुमान जी की वाणी में श्री राम क्या सुनते हैं

श्री राम प्रसन्न होकर श्री लक्ष्मण की ओर देखते हैं। किष्किन्धाकाण्ड 3.28–35 में वे हनुमान जी की परिपक्व वाणी को वेद और व्याकरण के अध्ययन से जोड़ते हैं। उनका ध्यान केवल शुद्धता पर नहीं है: मुख तथा चेष्टा में ध्यान भटकाने वाली विकृति नहीं, शब्दों में उलझाव नहीं और स्वर में कठोरता अथवा उतावलापन नहीं है। वाणी स्पष्ट और संतुलित है। श्री राम विचार करते हैं कि ऐसा दूत किसी राजा के कार्य सफल करा सकता है। विद्या सुनने वाले का ध्यान रखने की क्षमता बन गई है। इस प्रशंसा से वाक्पटुता और केवल शब्द-सजावट का अंतर भी खुलता है। भाषण प्रभावशाली हो सकता है, फिर भी उसका उद्देश्य अस्पष्ट रहे; हनुमान जी शिष्टता बनाए रखते हुए प्रयोजन स्पष्ट करते हैं। यहाँ भक्तिपूर्ण आदर और व्यावहारिक निरीक्षण साथ हैं। श्री राम उस बुद्धि का सम्मान करते हैं जिससे हनुमान जी दूसरे की सेवा करते हैं, और श्री लक्ष्मण को उतने ही स्नेह से उत्तर देने को कहते हैं। अच्छी वाणी अच्छे श्रवण और विचारपूर्ण प्रत्युत्तर को आमंत्रित करती है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, संस्कृत पाठ ↗

श्री लक्ष्मण भाइयों का वृत्तांत सौंपते हैं

किष्किन्धाकाण्ड 4 में श्री लक्ष्मण उस रूप के पीछे का वृत्तांत बताते हैं। श्री राम दशरथ के पुत्र हैं, पिता की आज्ञा में दृढ़ हैं और माँ सीता तथा छोटे भाई के साथ वन में रह रहे थे। माँ सीता का हरण हो गया है; खोज में सहायता कर सकने वाले सुग्रीव की ओर भाइयों को भेजा गया है। श्री लक्ष्मण अपना परिचय भाई के संबंध से और श्री राम के प्रति स्वेच्छापूर्वक अपनाई गई सेवा से देते हैं। उनके शब्दों में दुःख है: जो दूसरों को आश्रय देता है, वही अब सहायता चाहता है। यह स्वीकार बहुत अर्थपूर्ण है। मदद माँगने से श्री राम का गौरव कम नहीं होता और सहायता देने के लिए किसी दुःखी को छोटा करना आवश्यक नहीं। अब हनुमान जी को इस खोज की गहरी आवश्यकता समझ आती है। जो धनुष और तपस्वी-वस्त्र पहले प्रश्न उठाते थे, वे एक संपूर्ण जीवन-वृत्तांत में अपना स्थान पाते हैं। ध्यान से सुन लेने के बाद सुग्रीव के सामने जिम्मेदारीपूर्वक कही जा सकने वाली बात भी बदल गई है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 4, संस्कृत पाठ ↗

मंत्री संबंध का सेतु बनते हैं

हनुमान जी उत्तर में सुग्रीव का दुःख और मैत्री की आवश्यकता बताते हैं। साझा पीड़ा मिलने का अवसर देती है, पर वे सहानुभूति के शब्द कहकर नहीं रुकते। वे भाइयों को सुग्रीव से मिलने का प्रस्ताव देते हैं, अपना वानर रूप ग्रहण करते हैं और दोनों को उठाकर पर्वतीय आश्रय की ओर ले जाते हैं। किष्किन्धाकाण्ड 5 में वे सुग्रीव के सामने श्री राम-श्री लक्ष्मण का परिचय देकर उनका आदरपूर्वक स्वागत करने को कहते हैं। उनके कार्य की दोनों दिशाएँ देखें: पहले भाइयों के सामने सुग्रीव का प्रतिनिधित्व, फिर सुग्रीव के सामने भाइयों का परिचय। दोनों कथन आपस में संगत रहने चाहिए। किसी पक्ष के वचन बढ़ाकर कहने वाला दूत उसी मैत्री को क्षति पहुँचाएगा जिसे वह बनाना चाहता है। हनुमान जी की सेवा दोनों पक्षों को एक-दूसरे की स्थिति अधिक स्पष्ट करती है। संवाद के बाद होने वाली यात्रा में उनका बल काम आता है। इस प्रकार विवेकपूर्ण वाणी उपयोगी कर्म से जुड़ती है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 4, संस्कृत पाठ ↗ · वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 5, संस्कृत पाठ ↗

साझे संकल्प की साक्षी अग्नि

सुग्रीव मैत्री के लिए हाथ बढ़ाते हैं; श्री राम उनका हाथ ग्रहण करके उन्हें आलिंगन देते हैं। हनुमान जी अग्नि प्रज्वलित करते हैं, पुष्पों से उसका सम्मान करते हैं और दोनों मित्रों के बीच स्थापित करते हैं। वे अग्नि को साक्षी मानकर परिक्रमा करते हैं। फिर सुग्रीव अपना भय और हानि अधिक विस्तार से बताते हैं तथा श्री राम वाली के विरुद्ध सहायता का वचन देते हैं। माँ सीता की खोज और सुग्रीव की पुनःप्रतिष्ठा आगे के सर्गों में विकसित होती है; उनसे जुड़े कठिन निर्णय और दायित्व भी हैं। यहाँ मूल परिवर्तन सामने आ चुका है: अलग-अलग सहा जाने वाला दुःख साझा कार्य बन गया है। अग्नि वचन को गंभीरता देती है, किंतु उसका अर्थ आगे के कर्म में निभना चाहिए। हनुमान जी स्वयं को इस मैत्री का केंद्र नहीं बनाते। उनकी उपलब्धि यह है कि श्री राम और सुग्रीव अब प्रत्यक्ष मिलकर बात तथा संकल्प कर सकते हैं। योग्य मध्यस्थ अपने परिचय से आगे टिकने वाला संबंध संभव करता है।

भेंट से मैत्री तक

  1. सुग्रीव को आशंका हैदो सशस्त्र अपरिचित उनके आश्रय के निकट आते हैं।
  2. हनुमान जी पास जाते हैंवे आने का उद्देश्य पूछते हैं और अपना परिचय देते हैं।
  3. श्री राम वाणी का कौशल पहचानते हैंसंयम और विचारपूर्ण वाणी संवाद का मार्ग खोलते हैं।
  4. श्री लक्ष्मण बताते हैंमाँ सीता की खोज भेंट का उद्देश्य स्पष्ट करती है।
  5. हनुमान जी संबंध जोड़ते हैंश्री राम और सुग्रीव मिलकर मैत्री का संकल्प ले सकते हैं।
परिचय, सुनने और एक-दूसरे की आवश्यकता समझने से विश्वास बढ़ता है।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 5, संस्कृत पाठ ↗

विचारपूर्ण वाणी के दो अभ्यास

अभ्यास-उदाहरण: पुस्तकालय में नई स्वयंसेविका डिब्बे लेकर आती है। चिंतित व्यवस्थापक को लगता है कि किताबें बिना अनुमति उठाई गई हैं। सहायक मध्यस्थ परिचय और प्रयोजन से आरंभ करता है: “मीरा वे दान की पुस्तकें लाई हैं जिनकी बात संयोजक से हुई थी।” फिर वह व्यवस्था की पुष्टि करने का अवसर देता है। इसमें शिष्टता, उपयोगी सूचना और अगला कदम एक साथ हैं। दूसरा उदाहरण: छात्र को शिक्षक को बताना है कि समूह अपनी प्रदर्शनी आज पूरी नहीं कर पाएगा। वह बताता है कि कौन-सा भाग तैयार है, शेष को एक और दिन क्यों चाहिए तथा किस सहयोग से काम पूरा होगा। वह अनुपस्थित साथी पर दोष नहीं डालता। दोनों में हनुमान जी की स्पष्ट प्रयोजन वाली वाणी, सुनने वाले का सम्मान और उत्तर सुनने की तत्परता का अभ्यास होता है। संवाद को सफल मानने से पहले देखना चाहिए कि सामने वाले ने बात समझी भी है या नहीं।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, संस्कृत पाठ ↗ · वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 4, संस्कृत पाठ ↗

भक्ति कर्म का रूप लेने लगती है

हनुमान जी के बाद के अद्भुत पराक्रमों के सामने यह शांत मिलन छोटा लग सकता है। फिर भी मैत्री यहीं बनती है, क्योंकि वे विद्या, धैर्य, साहस और निष्ठा को साथ काम में लाते हैं। सुग्रीव की चिंता स्वीकारते हुए भी वे भय को एकमात्र मार्गदर्शक नहीं बनाते। श्री राम का आदर करते हुए दूत के व्यावहारिक कार्य पर ध्यान रखते हैं। श्री लक्ष्मण को सुनते हैं और फिर भाइयों को वचनबद्ध मिलन की ओर ले जाते हैं। विद्यार्थी के लिए इस क्रम में अभ्यास है: आदर से पास जाएँ, अपना दायित्व स्पष्ट करें, वास्तविक आवश्यकता सुनें और अगला उपयोगी कदम संभव करें। विश्वास को सच्चे शब्द और लंबे समय तक निभाया गया आचरण, दोनों चाहिए। पहले मिलन के हनुमान जी का स्मरण हमें आमंत्रित करता है कि जब किसी की आशा समझे जाने पर टिकी हो, तब हमारी बोलचाल भी भक्ति से दिशा पाए।

स्रोत: वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 3, संस्कृत पाठ ↗ · वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 4, संस्कृत पाठ ↗ · वाल्मीकि रामायण: किष्किन्धाकाण्ड, सर्ग 5, संस्कृत पाठ ↗

अभ्यास करें

सुनाएँ, सुनें और उत्तर दें

  1. पाँच चरण सुनाएँ: सुग्रीव की चिंता, हनुमान जी का परिचय, श्री राम की प्रशंसा, श्री लक्ष्मण का वृत्तांत और अग्नि-साक्षी मैत्री।
  2. वास्तविक बातचीत चुनें। एक स्पष्ट प्रयोजन, एक आदरपूर्ण प्रश्न और एक उपयोगी अगला कदम लिखें।
  3. साथी के साथ अभ्यास करें: सलाह देने से पहले दूसरे की आवश्यकता ठीक-ठीक अपने शब्दों में बताएँ।

अपनी समझ जाँचें

हनुमान जी पहले अन्य रूप में क्यों आते हैं?

वे सुग्रीव की ओर से बलशाली अपरिचितों का परिचय जानने आते हैं। बातचीत में अपना नाम, भेजने वाले और धारण किए रूप की बात स्पष्ट कर देते हैं।

श्री राम किस बात की प्रशंसा करते हैं?

वे विद्या से परिपक्व वाणी की प्रशंसा करते हैं: शुद्ध, स्पष्ट, संतुलित और मनोहर, शांत चेष्टा के साथ। ऐसी वाणी सौंपे गए कार्य को आगे बढ़ा सकती है।

श्री राम की परिस्थिति कौन बताते हैं?

श्री राम की प्रेरणा से श्री लक्ष्मण वनवास, माँ सीता-हरण और सुग्रीव की सहायता पाने के प्रयोजन का वृत्तांत कहते हैं।

हनुमान जी परिचय से आगे क्या करते हैं?

वे भाइयों को सुग्रीव तक ले जाते हैं, आदरपूर्वक परिचय कराते हैं और मैत्री की साक्षी अग्नि तैयार करते हैं। उनकी वाणी प्रत्यक्ष सेवा में परिणत होती है।

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