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भारत का भूगोल: भूभाग, नदियाँ, मानसून और राज्य

भारत के पर्वत, मैदान, पठार और तट बताते हैं कि नदियाँ कहाँ बहती हैं, वर्षा में अंतर क्यों होता है और बस्तियाँ कैसे विकसित होती हैं। नक्शे के नाम याद करने से पहले इन संबंधों को समझें।

PLS फाउंडेशन द्वारा · · 4 मिनट पढ़ाई, और अभ्यास

इस पाठ के अंत तक: वृष्टिछाया समझाएँ, नदी के जलग्रहण क्षेत्र को पहचानें और प्राकृतिक प्रदेश तथा राज्य में अंतर करें।

यह विषय सीधे पढ़ें, या शृंखला अपनाएँ: देश और उसकी संस्थाओं को समझें

मुख्य विचार

भारत के छह प्रमुख भौतिक विभाग हैं। नदियाँ ऊँचे भूभाग को मैदानों और समुद्र से जोड़ती हैं; मौसमी मानसूनी पवनें वर्ष का बड़ा हिस्सा वर्षा लाती हैं। राज्य-सीमाएँ प्रशासन व्यवस्थित करती हैं, जबकि भू-आकृतियाँ और नदी-घाटियाँ उन्हें पार करती हैं।

1. छह भौतिक प्रदेश और उनका निर्माण

हिमालय भू-पर्पटी की प्लेटों के टकराने से बने युवा वलित पर्वत हैं। उनके दक्षिण में उत्तरी मैदानों में जलोढ़ पाया जाता है: नदियों द्वारा लाई और जमा की गई रेत, गाद तथा मिट्टी। प्रायद्वीपीय पठार पुरानी कठोर चट्टानों का ऊँचा भूभाग है। पठार का ऊपरी विस्तार अपेक्षाकृत चौड़ा होता है; उसका बिल्कुल समतल होना जरूरी नहीं। चट्टान, ढाल और मिट्टी जलनिकास, खेती तथा परिवहन को प्रभावित करते हैं।

अन्य विभाग भारतीय मरुस्थल, तटीय मैदान और द्वीप समूह हैं। थार की जलवायु शुष्क है और वहाँ रेतीले भू-दृश्य मिलते हैं। तटीय मैदान ऊँचे भूभाग और समुद्र के बीच होते हैं। लक्षद्वीप अरब सागर के प्रवाल द्वीपों से जुड़ा है, जबकि अंडमान और निकोबार बंगाल की खाड़ी में हैं। ये अलग भू-दृश्य हैं; सभी को एक जैसा समुद्रतट नहीं समझना चाहिए।

स्रोत: आईआईटी कानपुर साथी पर एनसीईआरटी: भारत का भौतिक स्वरूप ↗

2. नदी एक जलग्रहण क्षेत्र का हिस्सा है

नदी का जलग्रहण क्षेत्र वह भूभाग है जिसका सतही पानी उस नदी और उसकी सहायक नदियों में पहुँचता है। सहायक नदी दूसरी नदी से मिलती है; जल-विभाजक पड़ोसी जलनिकास क्षेत्रों को अलग करता है। इसलिए एक पहाड़ी धार की दोनों ओर गिरा पानी अलग नदियों तक जा सकता है। गंगा, ब्रह्मपुत्र और सिंधु प्रमुख हिमालयी नदी-तंत्र हैं। कई हिमालयी नदियों को वर्षा तथा हिम या हिमनदों के पिघलने से पानी मिलता है। प्रायद्वीपीय नदियाँ मौसमी वर्षा पर अधिक निर्भर हैं; बाँध और भूजल भी प्रवाह बदलते हैं।

स्रोत: आईआईटी कानपुर साथी पर एनसीईआरटी: अपवाह ↗

3. मानसून वर्ष को कैसे बदलता है

मानसून पवन-परिसंचरण में मौसमी बदलाव है। ग्रीष्म मानसून में आसपास के समुद्रों से नम हवाएँ भारत के बड़े हिस्से में वर्षा लाती हैं। भूमि और समुद्र का असमान ताप तथा वायुमंडलीय परिसंचरण का मौसमी बदलाव इस व्यवस्था को बनाते हैं। पर्वत नमी का वितरण बदलते हैं। ढाल पर ऊपर उठती हवा ठंडी होती है; जलवाष्प संघनित होकर वर्षा कर सकती है। शिखर पार करके नीचे आती हवा गर्म और शुष्क होती जाती है; इसे वृष्टिछाया प्रभाव कहते हैं। इससे पश्चिमी घाट के पश्चिमी भाग और भीतरी दक्कन की वर्षा का अंतर समझ आता है।

पर्वत की धार वर्षा कैसे बदलती है

  1. नम हवाहवा समुद्र से जलवाष्प पर्वत की ओर लाती है।
  2. हवा ऊपर उठती हैपवनाभिमुख ढाल हवा को ऊपर उठाती है, जहाँ वह ठंडी होती है।
  3. वर्षा हो सकती हैठंडा होने पर जलवाष्प संघनित होकर बादल की बूँदें बनाती है; इस ओर वर्षा हो सकती है।
  4. सूखी होती उतरती हवाधार के पार नीचे उतरती हवा गर्म होती है, जिससे वृष्टिछाया बन सकती है।
पर्वतीय वर्षा की सरल व्याख्या। हवा की दिशा और स्थानीय परिस्थितियाँ महत्त्वपूर्ण हैं; वृष्टिछाया का अर्थ वर्षा का पूरी तरह अभाव नहीं है।

स्रोत: एनसीईआरटी: भारत की जलवायु ↗

4. मौसम, जलवायु और रोजमर्रा के फैसले

मौसम थोड़े समय की दशा है: आज की बारिश, हवा या तापमान। जलवायु कई वर्षों का सामान्य स्वरूप है। एक बहुत बरसाती दिन से शुष्क क्षेत्र की जलवायु नहीं बदल जाती। मानसून में तेज वर्षा के दौर और विराम भी आते हैं। समान कुल वर्षा कई हल्की बौछारों या कुछ तीव्र बारिशों में मिल सकती है। किसान को फसल के सही चरण पर नमी चाहिए; शहर को अचानक बहाव सँभालने वाले नाले चाहिए। केवल सालाना कुल वर्षा दोनों की पूरी जरूरत नहीं बताती।

स्रोत: एनसीईआरटी: भारत की जलवायु ↗

5. राज्य अलग प्रश्न का उत्तर देते हैं

राज्य शासन की इकाई है; भौतिक प्रदेश भूमि के स्वरूप का वर्णन है। महाराष्ट्र में एक ही राज्य के भीतर तटीय पट्टी, सह्याद्रि और पठारी भाग हैं। एक नदी का जलग्रहण क्षेत्र कई राज्यों को जोड़ सकता है। “यह शहर किस राज्य में है?” से पता और प्रशासन समझते हैं। “यह किस नदी-घाटी में है?” से पानी का संबंध समझते हैं। भूगोल में दोनों स्तर जरूरी हैं, क्योंकि प्रशासनिक सीमा नदी या मानसूनी हवा को नहीं रोकती।

स्रोत: विधायी विभाग: भारत का संविधान, 2024 ↗

6. उदाहरण: तट और भीतरी खेत

कल्पना करें कि समुद्र से नम हवा तटीय पहाड़ी तक आती है। गाँव क पश्चिमी चढ़ती ढाल पर है; गाँव ख धार के पीछे है। पर्वतीय वर्षा किसे अधिक मिलेगी? गाँव क को, क्योंकि हवा ऊपर उठकर ठंडी होती है। नमी कम हो जाने पर ख को कम वर्षा मिल सकती है। अब किसी एक तूफान में ख में बहुत बारिश हो जाए तो वृष्टिछाया गलत नहीं हो जाती; जलवायु की प्रवृत्ति हर दिन का वादा नहीं है। जल-संग्रह की योजना के लिए ख को भू-आकृति के साथ वर्षा रिकॉर्ड, मिट्टी और स्थानीय माँग भी जाननी होगी।

स्रोत: एनसीईआरटी: भारत की जलवायु ↗ · आईआईटी कानपुर साथी पर एनसीईआरटी: भारत का भौतिक स्वरूप ↗

अभ्यास करें

पानी का रास्ता समझाने वाला चित्र बनाएँ

  1. समुद्र, तटीय ढाल, धार और भीतरी जमीन बनाएँ। नम हवा के ऊपर उठने और नीचे आने के तीर लगाएँ।
  2. नदी, दो सहायक नदियाँ और जलग्रहण सीमा जोड़ें। बताएँ कि सीमा की दोनों ओर का पानी कहाँ जाएगा।
  3. चित्र पर “पैमाने के अनुसार नहीं” लिखें। पाँच वाक्यों में जलवायु, नदियों और राज्य-सीमाओं का अंतर समझाएँ।

अपनी समझ जाँचें

उत्तरी मैदानों में जलोढ़ क्यों मिलता है?

नदियाँ अपने जलग्रहण से अपरदित पदार्थ लाती हैं। प्रवाह धीमा होने पर उसे जमा करती हैं। बार-बार निक्षेपण से विस्तृत मैदान बनते हैं।

क्या पठार हमेशा समतल होता है?

नहीं। यह ऊँचा विस्तृत भूभाग है जिसमें पहाड़ियाँ, घाटियाँ और असमान सतह हो सकती हैं। बिल्कुल समतल ऊपरी भाग जरूरी नहीं।

पड़ोसी जगहों में वर्षा अलग क्यों हो सकती है?

ढाल और हवा की दिशा से एक जगह नम पवनाभिमुख भाग में और दूसरी वृष्टिछाया में हो सकती है। केवल दूरी वर्षा तय नहीं करती।

क्या एक नदी-घाटी कई राज्यों में हो सकती है?

हाँ। जलग्रहण क्षेत्र पानी के बहाव से बनता है, जबकि राज्य प्रशासन से। साझा जल-तंत्र के लिए सीमाओं के पार सहयोग जरूरी है।

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